Wednesday, May 6, 2009

तस्सवूर

तस्सवूर में जिस हूर हो हम देखा किए
उस हूर से आँखें चार हुई
तनहा खामोश अकेले इस दिल में
अजनबी सी एक झंकार हुई

धुआं उठा एक आग लगी
उल्फत की शमा रोशान हुई
तमन्ना-ऐ-दीदार ने करवट ली
ख़्वाबों की महफिल गुलशन हुई
मेरी नाज़रों की उस हूर की
नज़रों से मीठी तकरार हुई
तनहा खामोश अकेले इस दिल में
अजनबी सी एक झंकार हुई


न जाने तुम किस दुनिया से आई
दिल में ऐसा एक सवाल उठा
होगा जन्नत से कम क्या वोह जहाँ
फिर दिल में ऐसा ख़याल उठा
तुम्हे देखूं तुम्हे चाहूं, तुम्ही को सुनता रहूँ
यही आरजू दिल-ऐ-नादान में बेकरार हुई
तनहा खामोश अकेले इस दिल में
अजनबी सी एक झंकार हुई

2 comments:

  1. this reminds me of a master piece in Silsila..

    Main aur meri tanhayi aksar se baatein karte hai.. tum hoti to aaisa hota...


    great work... wonderful

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